रोज़ा : क्या है और किसे रोज़ा करना चाहिए ?......
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अरबी में रोज़ा को सौम कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है किसी चीज़ से रुकना और इसे त्यागना.
रमजान का पवित्र महीना फिर से सभी पर अपनी तमाम रहमतों, बरकतों और सादतों के साथ जलवा अफ़रोज़ हो रहा है. इस पवित्र महीने में अल्लाह की तरफ से अपने नेक बन्दों पर रहमतों और बरकतों की बारिश होती है. फ़रिश्ते रोज़ादारों के लिए इबादत करते हैं. इस महीने में रोज़ादारों की दुनयावी भागीदारी कम हो जाती है. वे अपना ज्यादातर वक्त अल्लाह की याद, उसकी इबादत, क़ुरान की तिलावत और फ़रीज़ व नवाफिल की अदाएगी में गुज़ारते हैं. इनके ज़रिए वे अल्लाह से अपने तअल्लुक़ को बढ़ाते हैं. रोज़ा हुक़ूक़ुल्लाह के साथ-साथ हुक़ूक़ुल इबादत पर भी ज़ोर देता है. नाराज़ लोगों को मानाने और उनसे बेहतर ताल्लुक़ात बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है.
रोज़ा क्या है और किसे रोज़ा करना चाहिए ?
अरबी में रोज़ा को सौम कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है किसी चीज़ से रुकना और इसे त्यागना. शरिया में रोज़ा का अर्थ है- अल्लाह की इबादात करने के इरादे से, मनुष्य सुबह सूर्य निकलने से लेकर डूबने तक खाने पीने और जिन्सी ज़रूरत पूरी करने से रुका रहे.
दिल्ली के ओखला में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक संस्था जामिया इस्लामिया सनाबिल के वरिष्ठ शिक्षक मौलाना फजलुर्रहमान नदवी न्यूज़ 18 से बात करते हुए कहते हैं कि रमज़ान का रोज़ा हर आक़िल और बालिग़ मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है. यह पागल, मजनूं और बीमार पर फ़र्ज़ नहीं है. वह कहते हैं कि बीमार व्यक्ति पर रोज़ा की फ़र्ज़ियत ख़त्म नहीं होती है, बल्कि बीमारी की स्थिति में उसे राहत दी गई है. वह अगले रमज़ान से पहले जब भी स्वस्थ हो जाए, शेष रोज़ा पूरा करे.
रोज़ा का उद्देश्य क्या है?
मौलाना नदवी का कहना है कि कुरान में रोज़ा का उद्देश्य तक़वा बताया गया है. तक़वा क्या है, इस पर मौनाला कहते हैं कि जब मनुष्य में यह सिफ़त पैदा हो जाए कि वह कोई काम करे तो यह देखे कि इस काम से अल्लाह राज़ी होगा या नहीं. अगर अल्लाह उस के इस काम से राज़ी होता है तो वह ये काम करे वर्ना उससे बाज़ आए. यानि कोई भी काम करते वक़्त मनुष्य उसमें अल्लाह की मर्ज़ी तलाश करे.
किन चीज़ों से रोज़ा पर पड़ता है असर ?
मौलाना कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति रोज़ा रखता है और झूठ बोलता है, चुगली करता है तो शरीयत की निगाह में यह तारिक सौम यानी रोज़ा न रखने वाला नहीं माना जाएगा. हां, रोज़ा रखने में जो असर मिलना चाहिए था उस में ज़रूर कमी आएगी.
कभी-कभार छोटे बच्चों को भी रखवाना चाहिए रोज़ा
यूं तो हर बालिग़ और अक़ील मर्द व औरत पर ही रोज़ा फ़र्ज़ है, लेकिन छोटे बच्चों में भी कभी-कभार रोज़ा रखने की आदत डालनी चाहिए. इस की हिकमत बताते हुए मौलाना कहते हैं कि जब कम उम्र में ही बच्चा रोज़ा रखने की आदत डालना शुरू कर देगा तो फिर बालिग़ होने के बाद उसे रोज़ा रखने में ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी. मौलाना कहते हैं कि सहाबा किराम अपने कम उम्र बच्चों से कभी-कभार रोज़ा रखवाते थे और बच्चों के हाथों में खिलौना थमा देते थे, ताकि बच्चे दिन भर खिलौने से खेलते रहें और इसमें उनका दिन आसानी से गुज़र जाए.
