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सावन का महीना शुरू हो रहा है. इस दौरान सावन सोमवार पर व्रत किया जाता है और सावन के महीने में सैकड़ों भक्त केसरिया रंग के वस्त्र पहनकर कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) निकालते हैं. कांवड़ में गंगा नदी का पवित्र जल भरते हैं और फिर भगवान शिव (Lord Shiva) का जलाभिषेक किया जाता है. लेकिन, हर साल सावन के महीने में कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है, इसके पीछे की वजह क्या है और वेद शास्त्रों में कांवड़ यात्रा को लेकर क्या पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जानें यहां.
मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने पहली कांवड़ यात्रा निकाली थी और वे पहले कांवड़िया थे. बताया जाता है कि भगवान परशुराम (Lord Parshuram) ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल ले जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था, तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी.
दूसरी कांवड़ यात्रा कथा
अन्य मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत श्रवण कुमार ने त्रेता युग में की थी. दरअसल, श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर पैदल यात्रा की और उन्हें गंगा स्नान कराया और लौटते समय वहां से अपने कांवड़ में गंगाजल भरकर लेकर आए. फिर भगवान शिव का अभिषेक किया. माना जाता है कि तब से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी.
तीसरी कांवड़ यात्रा कथा
कुछ अन्य मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा को लंकापति रावण से भी जोड़ा गया है. कहा जाता है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और समुद्र मंथन से निकलने वाले विष का पान करने से भगवान शिव का गला जलने लगा, तब देवताओं ने तो जल अभिषेक किया ही इसके अलावा शिवजी ने अपने परम भक्त रावण को याद किया. रावण ने कांवड़ से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया जिससे शिवजी को विष के प्रभाव से मुक्ति मिली.