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इससे पहले गुरुवार को भारतीय मौसम विभाग की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सोमा सेनरॉय ने एनडीटीवी से कहा था कि हमारा पूर्वानुमान है कि अल नीनो रहेगा और हिंद महासागर डिपोल पॉजिटिव रहेगा. यूरेशियन बर्फ की चादर भी हमारे लिए फेवरेबल है. अल नीनो का असर तो जरूर दिखेगा. लेकिन मेरा कहना है सिर्फ एक फैक्टर से मॉनसून प्रभावित नहीं होता है. हमारे मॉनसून पर दो-तीन वैश्विक कारक है, जो मॉनसून पर असर डालते हैं. उसमें अल नीनो फेवरेबल नहीं है मगर इंडियन महासागर द्विध्रुवीय फेवरेबल है. इन सबको फैक्टर करके हमने कहा है कि मॉनसून नॉर्मल रहने की संभावना है".
मौसम विभाग के मुताबिक- पिछले 16 मॉनसून सीजन में जब अल नीनो रहा है, उसमें यह देखा गया है कि 9 बार मॉनसून औसत से कमज़ोर रहा है और बाकी 7 बार मॉनसून नार्मल रहा है. हाल ही में एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में पृत्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम रविचंद्रन ने कहा था कि वो सामान्य मॉनसून की उम्मीद कर रहे हैं. अल नीनो एकमात्र कारक नहीं है जो वैश्विक पवन पैटर्न को प्रभावित करता है. अटलांटिक नीनो, हिंद महासागर डिपोल और यूरेशियन स्नो कवर आदि जैसे अन्य कारक भी हैं जो मानसून को प्रभावित कर सकते हैं.
Science journal में छपे एक नए शोध में दावा किया गया है कि अल नीनो की वजह से 1982-83 और 1997-98 में ग्लोबल इनकम में $4.1 ट्रिलियन और $5.7 ट्रिलियन तक का नुकसान हुआ था. शोध में दावा किया गया है कि 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक स्तर पर आर्थिक नुकसान $84 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है.