यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ...
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रायपुर। कृष्ण एक ऐसा व्यक्तित्व जो बहु आयामी है।हिन्दू भगवानों में प्रमुख कृष्ण को विष्णु जी का आठवां अवतार माना जाता है.
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
एक ऐसे महापुरुष जिनका पूरा जीवन विभिन्न घटनाओं से भरा हुआ । प्रेरणा से ओतप्रोत ऐसे महान आत्मा को जन्मदिन पर मेरा नमन।
कृष्ण जी का जीवन जन्म से मृत्यु तक संघर्षो से भरा हुआ था।उनका जन्म हुआ तो आधी रात में ,अंधेरे में एक कारावास में…. पर अपने कर्मो से अपने जीवन से दुनिया को बतलाया कि इंसान चाहे कही भी कभी भी जन्म ले ,वो अपने कर्मो से ही महान बनता है।उसकी सोच ही समय को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते हैं। कंस को जब पता चला कृष्ण जीवित हैं और ब्रज में है तो उसने पूतना राक्षसी को भेजा ।जिसे कृष्ण ने छठी के दिन ही यमलोक पहुँचा दिया।
उन्होंने कालिया नाग का दमन किया जिस प्रसंग से हमे ये सीखना है कि हमे अपने जीवन मे क्रोध रूपी काला पन को दूर करना है।यूँ तो कृष्ण माखनचोर ,मटकीफोड़ ,
गोपियों के वस्त्र चुराने वाले नटखट के रूप में जाने जाते हैं पर उन्होंने7 वर्ष की उम्र में गोवर्धन पर्वत उठा कर बतला दिया कि समय आने पर वो अपने परिवार की अपनी प्रजा की रक्षा भी बखूबी कर सकते हैं
कृष्ण की लीलाओं में मटकीफोड़ने का जो प्रसंग है उससे हमे ऐसे समझना चाहिय ।भरी मटकी मतलब अहंकार …जिसे हमे तोड़ना है फोड़ना है और छोड़ना है।यदि हमें कुछ सीखना है भक्ति करनी है तो अंदर से खाली होंना पड़ेगा रीता होना पड़ेगा।आप भरे दिमाग मे कुछ और नही भर पाएंगे।
एक प्रसंग आता है कालिया नाग के दमन का …कालिया नाग के दमन से कृष्ण बतला रहे हैं कि हमे क्रोध रूपी काले नाग का दमन करना होगा तभी हम एक सही नेतृत्व कर पाएंगे।
कृष्ण का रंग है श्याम,नील काला ,जो सबसे उपेक्षित रंग है।पर देखा जाए तो वो रंग सब रंग को अपने मे समाहित कर लेता है अर्थात पूर्ण है।समाज को एक संदेश देते हैं कृष्ण की काला रंग निंदनीय नही है उसकी उपेक्षा नही करना चाहिये।काला रंग ऐसा रंग है जिस पर कोई रंग नही चढ़ता,इसलिय कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा बाई कहती हैं- लाल न रँगाऊँ मैं हरि न रँगाऊँ,
श्याम रंग में मोहे रंग दे सांवरिया।
कृष्ण जी की शिक्षा सांदीपनि के आश्रम में हुई जहाँ उनके मित्र बने सुदामा।आज भी हजारों वर्षों के बाद,और आज के इस आधुनिक युग मे मित्रता की मिसाल देनी हो तो कृष्ण-सुदामा की ही दी जाती
है।जात-पात, ऊँच-नीच के भेद को भूल कर निभाई गयी मित्रता।
राधा के साथ उनका आध्यात्मिक प्रेम ने उन्हें प्रेम के उच्चतम रूप की व्याख्या की है।कही कोई मन्दिर ऐसा नही है जहाँ कृष्ण अकेले हों।युवावस्था में पहुँचते ही उन्होंने मामा कंस और शिशुपाल का वध करके मथुरा के लोगों को दुष्ट राजा से प्रजा को राहत पहुँचायी थी ,और उग्रसेन को पुनः राजा बनाया।
यहाँ उनसे शिक्षा मिलती है कि अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आकर ही हम कोई भी बड़ा कार्य कर सकते हैं। निकलकर रुक्मिणी के प्रेम निवेदन भरे आग्रह को ध्यान रखते हुए उन्हें भले अपहरण कर के लाया। पर विधिवत विवाह कर उन्हें पटरानी का दर्जा दिया। लोग कहते हैं कृष्ण की 16 हजार रानियां थी,पर वो ऐसी नारियां थी जिन्हें कृष्ण ने किसी न किसी दुष्ट राजा से व्यक्ति से बचाया था और सुरक्षा दी।
द्रौपदी के चीर हरण के समय उनकी सहायता करके सन्देश दिया कि स्त्री की इज्जत की रक्षा करना चाहिए। आज हम कृष्ण को ज्यादा गीता के उपदेश की वजह से महान मोटिवेशनल वक्ता के रूप में मान सकते हैं।उनके उपदेश को दिए हुए भले हजारों वर्ष हो गए पर वो आज भी प्रासंगिक हैं।
कृष्ण की प्रिय बांसुरी को हम कैसे भूल जाएं जो सन्देश देती है कि जीवन मे कितने भी छेद हों अर्थात परेशानी हो पर अपना स्वर मधुर ही रखना है। कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन बुलंद हौसले और जीवंतता की कहानी है।उनके जीवन की हर घटना प्रेरणा देती है।कृष्ण के हौसले और सकारात्मक सोच जैसा हम भी अपना जीवन जियें।