Wednesday, 12 August 2026

मुज़फ़्फ़रपुर की उन 44 बच्चिया कितने दर्द और ख़ौफ़ के बीच गुजरी होगीं

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घटना ने देश की सत्ता को पूरी तरह उधेड़ दिया है. काश कि हमारा देश उबल पड़ता.....

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ठंडी ज़मीन के टुकड़े के भीतर बच्चियों की लाश तलाशने की कोशिश नाकाम रही. कोई नहीं जानता कि वाक़ई उस बच्ची की बलात्कार करके हत्या की गई या नहीं. मैं मुज़फ़्फ़रपुर की उन 44 बच्चियों की बात कर रही हूं जिनका 2013 से कथित तौर पर लगातार बलात्कार हो रहा था. मैं उन बच्चियों से नहीं मिली हूं लेकिन मेरी रूह वहीं पड़ी है. मैं देख पा रही हूं उन्हें अपने भीतर. उनके सारे पंख लहूलुहान हैं. वे दबी ज़ुबान में चीख रही हैं. सलाखों वाली ऊंची खिड़कियों से आ रही तेज़ रौशनी में उनके चेहरे के सारे रंग उड़ गए हैं. एक लेखक के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या होगी कि बार-बार उसे अमानवीय घटनाओं से गुज़रना पड़े.

बालिका अल्पावास गृह की 44 लड़कियों में से 34 के साथ बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है. तीन लड़कियां गर्भवती हैं. दो लड़कियां बीमार हैं जिसकी वजह से उनकी मेडिकल जांच नहीं हो पाई है. गर्भवती लड़कियों को लेकर दो अलग-अलग रिपोर्ट हैं. पटना सिटी के गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल की रिपोर्ट में इन लड़कियों के गर्भवती होने की पुष्टि की है, पर पीएमसीएच के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हुई है. 

बीमार दुनिया का सोग

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह का एक कमरा
Image captionमुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह का एक कमरा

मुख्य अभियुक्त ब्रजेश सिंह के 'स्वाधार गृह' से 11 लड़कियां लापता हैं. मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह का मामला अब सीबीआई को सौंपा जा चुका है. पर ये भरोसा बनता नहीं है कि उन बच्चियों को न्याय मिल पाएगा. मैं जिस दुनिया का सोग मना रही हूं वो पहले से ही बीमार है. अब वो मर चुकी है. जब औरतों की देह पर हमला हो या बच्चियों के बदन से उनका मांस नोच लिया जाए तो ये समझना होगा कि इसके पीछे पूरा विचार है. सत्ता और अश्लील पूंजी का खेल है. पता नहीं कैसी-कैसी भयानक बातों के आसार हैं. ये कल्पना का अंत है. ये वीभत्स विचारधारा बैठकों में, बदबूदार बिस्तरों में जन्म लेती है. हमारा सामान्य व्यवहार, हमारा समाज हमारे सपने तक आरंजित हैं.

इस घटना ने देश की सत्ता को पूरी तरह उधेड़ दिया है. काश कि हमारा देश उबल पड़ता. आग लग जाती, खेत-खलिहान जल उठते. इन बच्चियों की अंतहीन अंधेरी यातना भरी रात का अंत भी हो जाता. पर नहीं मालूम कि अभी और कितने दर्द और ख़ौफ़ के बीच इन्हें गुज़रना है. कोर्ट-कचहरी में हर बार अपने साथ हुए बलात्कार का बयान करना है. 

अख़बारों की भूमिका

ब्रजेश ठाकुर का अख़बार प्रात: कमल
Image captionब्रजेश ठाकुर का अख़बार प्रात: कमल

फ़िलहाल मामला सीबीआई के पास है. हमारे देश में सीबीआई की भूमिका किसी से छुपी नहीं है. पिछले तमाम मामलों में सीबीआई ने क्या किया? मुज़फ़्फ़रपुर का ही नवरुणा कांड हो या कठुआ का मामला सीबीआई किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. महिला संगठनों की लगातार मांग थी कि मुज़फ़्फ़रपुर समेत तमाम बाल गृहों और आश्रय गृहों की जांच हाईकोर्ट के जज की अध्यक्षता में कराई जाए. 2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने बालिका गृह मसले पर स्वत: संज्ञान लिया और केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेजा है. सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला महिला संगठनों के संघर्ष की जीत है.

प्रात: कमल का दफ़्तर

पहली बार इस मामले को लेकर पटना के सभी महिला संगठनों ने प्रदर्शन किया था. उनके प्रदर्शन को किसी स्थानीय अख़बार ने नोटिस नहीं लिया. इतनी भयानक ख़बरों पर अख़बार की चुप्पी कोई साधारण चुप्पी नहीं है. इसके पीछे पूरा तंत्र है. अख़बारों की भूमिका पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, पर इस बार अख़बारों की भूमिका पर संदेह भी है. क्योंकि बालिका गृह चलाने वाले ब्रजेश ठाकुर भी पत्रकार रहे हैं. पत्रकारिता को शर्मसार करने की कहानी लंबी है और इसकी शुरुआत उनके पिता के समय से हुई. 

शिक्षक से करोड़ों के साम्राज्य तक

सफेद शर्ट में ब्रजेश ठाकुर
Image caption सफेद शर्ट में ब्रजेश ठाकुर

एक शिक्षक से अख़बार का मालिक होने और करोड़ों रुपए की कमाई के पीछे किन लोगों की सांठ-गांठ थी, ये अब धीरे-धीरे खुल रहा है. 'विमल वाणी ' नाम का अख़बार चलाने वाले ब्रजेश ठाकुर के पिता राधामोहन ठाकुर मुज़फ़्फ़रपुर के हरिसभा के पास कल्याणी स्कूल के टीचर थे. एक टीचर ने कुछ ही सालों में अपने अख़बार के माध्यम से खूब सरकारी विज्ञापन बटोरा. अपने पिता के रास्ते पर चलते हुए ब्रजेश ठाकुर ने 'प्रातः कमल' निकालना शुरू किया. जिन तीन अखबारों- हिंदी के प्रातः कमल, अंग्रेज़ी के न्यूज़ नेक्स्ट और उर्दू के हालात-ए बिहार के लिए ब्रजेश ठाकुर को लाखों रुपए के विज्ञापन मिलते थे उस विभाग के मंत्री ख़ुद नीतीश कुमार हैं.

इस विभाग की जो गवर्निंग बॉडी है उसमें आउटसोर्सिग एजेंसियों के संचालक भी शामिल हैं. इन दो एजेंसियों में से एक संघ-भाजपा का एनजीओ भी शामिल है, जिसके जिम्मे मुख्यमंत्री के बयानों और कार्यक्रमों की ख़बरों के प्रसारण का जिम्मा है.

  • मुज़फ़्फ़रपुर का बालिका गृह

करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले ब्रजेश ठाकुर ने 'सेवा संकल्प और विकास समिति' के नाम से 8 अप्रैल 1987 को अपनी संस्था का अनुबंध कराया. नियम ये है कि ऐसी समिति में परिवार का एक ही सदस्य हो सकता है, पर इसमें उनके पुत्र राहुल आनंद सहित कई रिश्तेदार शामिल हैं. ब्रजेश ठाकुर की राजनेताओं के बीच गहरी पैठ थी. हत्या के मामले में उम्रक़ैद काट रहे आनंद मोहन की पार्टी से उन्होंने 1995 में विधानसभा का चुनाव लड़ा. आनंद मोहन से लेकर राजद, जदयू और भाजपा के नेताओं से इसकी गहरी सांठ-गांठ की बात खुल रही है.

ब्रजेश ठाकुर के काले कारनामों की लंबी कहानी है. बहुत सी बातें बाहर आ रही हैं. लेकिन सवाल है कि इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस) के सोशल ऑडिट से पहले भी बालिका गृह में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसकी ख़बर सरकार को क्यों नहीं थी? थी तो फिर कोई पहल क्यों नहीं हुई?

मुज़फ़्फ़रपुर का बालिका गृह

आंकड़े बताते हैं कि हर रोज़ महिलाओं पर की जा रही हिंसा में इज़ाफा हो रहा है. निर्भया कांड के बाद जब पूरा देश आंदोलित था तो उम्मीद थी कि ज़ुल्म की रात ख़त्म होगी. 

जस्टिस वर्मा कमेटी के कई महत्वपूर्ण सुझावों को सरकार ने माना भी है. पर सच ये है कि जैसे-जैसे कानून सख़्त हुए महिलाओं पर हिंसा तेज हुई. अब तो छोटी बच्चियां निशाने पर हैं. खून से भीगी हमारी बेटियों की लाश पर इस देश को राजनीति करनी तो आती है पर उसका समाधान निकालने के लिए वे प्रतिबद्ध नहीं हैं.

उच्च स्तर की मिलीभगत?

इस जघन्य और अमानवीय घटना की जिम्मेदारी को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं उसका जबाव तो भाजपा और नीतीश की सरकार को देना ही होगा. पिछले 1 फरवरी 2018 में सरकार को टिस की रिपोर्ट मिल गई थी. तब मई के अंत तक कार्रवाई और एफ़आईआर के लिए इंतज़ार क्यों किया गया? 28 मई को एफआईआर दर्ज होने के बाद वहां रहने वाली लड़कियों को अलग-अलग ज़िलों में भेज दिया गया. उनके बयान लेने और जांच में काफी समय लगाया गया. जिस बालिका गृह में 44 में से 34 लड़कियों के बलात्कार की पुष्टि हुई, यह कैसे संभव है कि वहां हर महीने जांच के लिए जाने वाले एडिशनल ज़िला जज के दौरे के बाद भी मामला सामने नहीं आया?

बालिका गृह के रजिस्टर में दर्ज है कि न्यायिक अधिकारी भी आते थे और समाज कल्याण विभाग के अधिकारी के लिए भी सप्ताह में एक दिन आना अनिवार्य था. जबकि बालिका गृह के लिए पूरा नियम बना हुआ है. जिसमें समाज कल्याण विभाग के पांच अधिकारी होते हैं, वकील होते हैं, सामाजिक कार्य से जुड़े लोग होते हैं. इतने लोगों की निगरानी के बावजूद 34 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ. क्या ब्रजेश ठाकुर को 12 एनजीओ चलाने की इजाज़त उच्च स्तर की मिलीभगत के बगैर संभव है? समाज कल्याण मंत्रालय और कल्याण विभाग के सचिव की इसमें क्या भूमिका है?

'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे जुमले और दहेज़ के ख़िलाफ़ बिहार में नई मुहिम चलाने वाली नीतीश सरकार के राज्य की बेटियां जिंदा लाश हैं. इससे भयावह क्या होगा कि 7 वर्ष से लेकर 15 वर्ष की बच्चियों का सरकारी संरक्षण में बलात्कार किया गया हो. नीतीश कुमार के लिए अब यह मामला आसान नहीं है. 

बिहार सरकार की राह आसान नहीं

आने वाले चुनाव में ये सवाल उनके लिए गहरी खाई खोद सकता है. ये भी आरोप लग रहे हैं कि भाजपा के तार भी इस घटना से जुड़े हैं. विपक्ष की दो मांगों में समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा और नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा के बर्खास्तगी की मांग शामिल है. इन दोनों पर ब्रजेश ठाकुर के साथ गहरे संबंध के आरोप हैं. बिहार सरकार की राह आसान नहीं है. विपक्ष इस मुद्दे पर उन्हें लगातार घेर रही है. 2 अगस्त को सभी वाम दलों की तरफ से बिहार बंद के असर ने भी नीतीश सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है. इन तमाम बहसों और राजनीतिक शोर के बीच क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि जिन 34 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ उन्हें न्याय मिल पायेगा?

जब पूरी दुनिया में हमारा मुल्क महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह घोषित हो, वैसे देश की ग़रीब और अनाथ बच्चियों के लिए कौन सोचता है? जिन्हें सिगरेट से जलाया गया, रॉड से पीटा गया, नींद की गोलियां देकर बलात्कार किया गया, गर्म लोहे से दागा गया. फिर भी वे जिंदा हैं. इस दागदार दुनिया के बावजूद कुछ उम्मीदें बचीं हैं. हम कामना करें अक्षम्य बर्बरता और असमानताओं के हम कभी आदी ना हों. घोर दुखों के बीच खुशी के अंकुर तलाश लें. लजाते सौन्दर्य का उसकी खोह तक पीछा करें और सबसे अहम है न्याय के लिए उम्मीद बनी रहे.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं. लेखिका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी हुई हैं.)

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