चातुर्मासिक प्रवचन में अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी शांत क्रांति जैन संघ के आचार्य विजयराज महाराज ने कही...
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रायपुर. राग के सूक्ष्म धागे से तन और मन बंधे हैं। लाखों-लाखों शत्रुओं को जीतने वाला व्यक्ति भी इस राग के बंधनों को नहीं काट पाता है। ऐसे तो हम स्वतंत्र कहलाते हैं लेकिन आत्मा और मन को ये राग बांध कर रखता है। मोक्षार्थी पापभीरू होता है। सामने मौत भी आ जाए तो भी नहीं डरता लेकिन पाप से डरता है। राग बहुत बड़ा पाप है। राग से पापों को प्राण,ऊर्जा, शक्ति मिलती है। हम राग के पाप से मुक्त नहीं, हमारे भीतर अनुकूलता का आकर्षण होता है। उक्त बातें आज मंगलवार को पचपेढ़ी नाका स्थित नाकोड़ा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचन में अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी शांत क्रांति जैन संघ के आचार्य विजयराज महाराज ने कही।
00 रागी की चार आकांक्षाएं होती है :
आचार्यश्री ने कहा कि रागी की कुछ आकांक्षाएं होती है। रागी सबसे पहले सुविधा चाहता है। गर्मी में ठंडा-ठंडा और सर्दी में गर्म-गर्म की इच्छा ही अनुकूलता की सुविधा है। सुविधा अनुकूल हो तो रागी संतुष्ट होता है। यदि अनुकूलता में असुविधा हो ता उसके मन में द्वेष पैदा हो जाएगा। अनुकूलताओं में निरंतर परिवर्तन होते रहता है। आपके पुण्य उदय में है तो ही अनुकूलता होगी, नहीं है तो कितना भी चाह रखो कुछ नहीं होगा। पुण्य के भोग में कर्म का बंध और पुण्य के राग में कर्म की निर्झा होती है। पाप जीव को किसी न किसी जन्म में भोगना पड़ेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि रागी सम्मान चाहता है। कोई यदि अपमान कर दे तो रागी को बर्दाश्त नहीं होता। रागी चाहता है कि घर वाले, परिवार-नाते रिश्तेदार और बाहर वाले सभी सम्मान दें। तीसरी आकांक्षा रागी चाहता है ख्याति। रागी चाहता है कि उसकी समृद्धि का गुणगान, स्तुति, पूजा-प्रतिष्ठा होनी चाहिए। चौथी आकांक्षा पदार्थों का उपभोग। रागी चाहता है सभी अनुकूल सामग्री मिले। इन इच्छाओं की पूर्ति ना हो तो आर्तध्यान पैदा होता है। जैसे सांप के शरीर से केचुली निकल गई तो वो मुड़कर केचुली की तरफ नहीं देखता। ये केचुली उसके लिए बंधन थी। वैसे ही जिसे ज्ञान हो जाए राग मेरे लिए बंधन है तो इस बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
00 राग को जीतने वाला मस्त रहता है :
आचार्यश्री ने कहा कि जिसने राग को जीत लिया या जीतने का प्रयास करता है वो मस्त रहता है। जो नहीं करता उसके सामने कभी राग के रंगीन चित्र आते हैं। कभी-कभी द्वेष की भयावह बाते आती है। आप पिक्चर हॉल जाते हैं तो सामने कितने चित्र आते हैं। व्यक्ति सोचता है ये बनावटी-दिखावटी है। ये केवल हमारे मनोरंजन करने के लिए दिखाए जा रहे हैं। जैसे व्यक्ति यहां तटस्थ रहता है, वैसे संसार में आप तटस्थ रहें। ज्ञानी कहते हैं राग के पाप से मुक्त होने के लिए राग के दोषों पर चिंतन करें।
00 दो काम राग से मुक्त करते हैं :
आचार्यश्री ने कहा कि राग का त्याग या त्याग का राग करो। राग से मुक्त होने के ये दो काम है। इन दो में से एक तो करना पड़ेगा। तब हम राग के पाप से मुक्त हो जाएंगे। ऐसा सोचो ये संसार मेरा नहीं, मैं इसका नहीं। ये शरीर मेरा नहीं, मैं इसका नहीं। आपका त्याग-वैराग्य से कनेक्शन जुड़ गया तो आप ऐसे पाप नहीं करोगे जिसका प्रायश्चित बड़ा हो। राग की फुलावट हम संसारी में बहुत हैं। किसी भी घर में चले जाएं वहां पुरानी वस्तुएं देखने को मिलेगी, चाहे कुछ काम की ना हो। जितना हमारा संग्रह होगा उतनी ममता पैदा होती है। ये ममता ही राग को बढ़ावा देती है। राग की प्रवृत्ति, वृत्ति और पुनरावृत्ति करते चलोगे तो ये खराब है। कल जिस राग को हमने खराब समझा था, आज उसी को करने लगे। जिसको अभी समझा था कुछ देर बाद करने लगते हैं।
00 राग का सुख क्षण भर :
आचार्यश्री ने कहा कि शहद लिपटी छुरी को चाटने से थोड़ा सा सुख मिलता है लेकिन परिणाम गंभीर आते हैं। लोगों की जुबान कट जाती है। इसका दर्द जीवन भर चलता रहता है। ज्ञानी कहते हैं कि राग का सुख क्षण भर का होता है और राग का दुख अनंत समय तक रहेगा,हम दूसरा जन्म क्यों न ले लें। राग का मतलब जो रास्ता गिरावट का और वैराग्य का मतलब जो रास्ता ऊपर उठा दे। ये राग का खंभा इतना गहरा गड़ा हुआ है कि इसको उखाडऩे में समय लगेगा।
00 हमें काम राग का त्याग करना होगा :
आचार्यश्री ने कहा कि हमें काम राग का त्याग करना चाहिए। साध्वी प्रियदर्शनाजी मसा के संसार पक्षीय भाई और भाभी देवेन्द्र और सरोज कोठारी ने कुशील के त्याग का नियम दिलाने की विनती की है। ये अब आजीवन सदाचारी बनना चाहते हैं। हालांकि ये सदाचारी ही हैं, गृहस्थ जीवन का सदाचार है इनमें। ये दोनों एक पति-पत्नी निष्ठ हैं। आचार्यश्री के प्रवचन के पश्चात दोनों ने कुशील सेवन नहीं करने का पच्खाण लिया। रायपुर संघ की तरफ से सभी ने अनुमोदना की। बड़ी तपस्या के लिए धन्यवाद दिया।
00 साढ़े 4 वर्ष के बालक ने त्यागा रात्रि भोजन :
आचार्यश्री से आज साढ़े 4 वर्ष के बालक आगम सोनु पारेवाल इंदौर निवासी ने रात्रि भोजन के त्याग का पच्खाण लिया। इसी तरह तेला तप का पच्खाण शिवाजी हलवाई, बेला तप का प्रशांत मालू और उपवास का प्रकाश गोलछा ने पच्खाण लिया। मासखामण की लड़ी में आज करण गोलछा ने 20 और मितीषा गोलछा ने 13 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। इसी तरह अन्य तपस्याओं का क्रम भी जारी है।
