जीवन में अगर श्रीमंत बनेंगे तो पड़ोसी की ईष्या के पात्र बनेंगे...
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रायपुर। जैनाचार्य विजय कीर्तिचंद्र ने कहा कि मनुष्य को कभी भी शरीर, संपत्ति और सत्ता पर गर्व नहीं करना चाहिए। ये सभी अनित्य हैं। किसी पर भी नित्यता का आरोप नहीं कर पाएंगे। वैभव भी शाश्वत नहीं है। आज राजा, तो कल रंक। शक्ति, सम्पत्ति और सत्ता के समय नम्र बन जाइए। ऐसा करने से हमरी संकल्प शक्ति बढ़ेगी। हम भगवान के शासन की साधना कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि वैराग्य प्राप्त करना आसान है, वैराग्य की लब्धि का उपयोग न करना कठिन है।
आचार्य ने उक्त विचार आज विवेकानंद नगर स्थित श्री संभवनाथ जैन मंदिर प्रांगण की धर्मसभा में भगवान महावीर के समकालीन पट्टशिष्य़ धर्मदास रचित आगम ग्रंथ उपदेश माला पर प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में ऐसे असंख्य दृष्टांत हैं, जिसमें थोड़े से निमित्त पा कर आत्माएं वैराग्य को प्राप्त कर लेती हैं। हमारे जीवन में अनेक आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक दुखों के बावजूद हमरी दृष्टि वैरागी नहीं हो पाती है। हम अपने संबंधियों को श्मशान में फूंक आते हैं। श्मशान में क्षणिक वैराग्य उत्पन्न होता है। घर आकर ठंडे पानी से नहाने पर वैराग्य धुल जाता है।
आचार्य़श्री ने कहा कि आप करोड़ों ग्रंथ पढ़ लें, मन वैरागी नहीं होता है। सभी साधर्मियों को उपदेश माला ग्रंथ पढ़ना चाहिए। यदि यह भी संभव नहीं है तो मोक्ष मिलने वाले किसी एक श्लोक को कंठस्थ कर लें और हृदयस्थ कर लें। उसका मनन करें। स्वयं उसकी अनुुभूति करें। वह श्लोक आपकी आत्मा को जागृत कर देगा। आपके आत्म कल्याण के लिए एक ही संजीवनी औषधि सक्षम है। व्यर्थ में मेहनत मत करो। एक ही श्लोक का चिंतन करें आपके हृदय के द्वार खुल जाएंगे।
आचार्य़ ने कहा कि जीवन में अगर श्रीमंत बनेंगे तो पड़ोसी की ईष्या के पात्र बनेंगे। धर्मी बनेंगे तो परिवार शत्रु बन जाएगा। हमें जीवन में आगे बढ़ना है । चाहे रास्ते में पहाड़ आए या दीवार। सभी को तोड़ते हुए लक्ष्य प्राप्त करना है। हमें साधना करते हुए अपनी आत्मा के पापों को धो डालना है और मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ना है। वैरागी भाव से, दृष्टा भाव से दुनिया को देखना है।
