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12 बरस की ये लड़की चलाती है लाइब्रेरी....
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शाम के 4 बजते ही भोपाल की उस झुग्गी-बस्ती में एक चबूतरे पर किताबें सज जाती हैं. इस लाइब्रेरी को 12 बरस की बच्ची चलाती है. वो कहती है, ऐसी किताबों का क्या मतलब जो पढ़ी न जाएं. बच्ची अपने से बड़ी उम्र के बच्चों को पढ़ाती भी है.
(भोपाल की दुर्गानगर झुग्गी बस्ती की 12 बरस की मुस्कान झुग्गी में ही लाइब्रेरी चलाती है. 3 साल पहले अपनी ही किताबों से शुरू हुई इस लाइब्रेरी में आज रोज़ाना 30 से 35 बच्चे पढ़ने आते हैं. मुस्कान को कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. पढ़िए, मुस्कान की कहानी)
वे पूछ रहे थे कि किस बच्चे को सबसे अच्छी तरह से पढ़ना आता है. सब डर गए. सहेलियों ने कहा, अपना नाम मत लेना, ये लोग तुझे पकड़कर ले जाएंगे. मैं हाथ उठा चुकी थी. बाद में पता चला, वे लोग शिक्षा विभाग से थे. मेरे अच्छी तरह पढ़ पाने पर सब बहुत खुश हो गए और मुझे 25 किताबें तोहफे में दीं.
साल 2015 की बात है. मैं रातभर किताबों के ढेर को अपने तकिए के पास रखकर सोई. जैसे ही पलटती, किसी किताब से नाक टकराती तो किसी से हाथ. सुबह स्कूल गई तो भी किताबों के बारे में सोचती रही. मां-पापा और बड़ी बहन से बात की. अगली शाम अपनी झुग्गी के बाहर बने चबूतरे पर मैं उन 25 किताबों के साथ थी. झुग्गी के संगी-साथी जमा थे. बड़े लोग भी पूछने लगे.
25 किताबों के साथ ये हमारी लाइब्रेरी थी और मैं वहां की लाइब्रेरियन.
वो किताब किस काम की, जिसे कोई पढ़ना न जानता हो. झुग्गी के अधिकतर बच्चे स्कूल नहीं जाते थे. मैंने उन्हें कहानियां सुनानी शुरू कीं. कोई कहानी शुरू करके खत्म नहीं करती थी. ऐसा मैंने एक टीवी सीरियल में देखा था. अधूरी कहानी को पूरा सुनने के लिए वे लोग दूसरे दिन भी आते. तब एक नई कहानी शुरू कर देती थी. धीरे-धीरे अपने साथी बच्चों को पढ़ाने लगी.
बड़ों को भी अच्छा लगने लगा कि उनके बच्चे पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं. उन्होंने चबूतरे पर तिरपाल तान दी ताकि धूप और बारिशों में भी लाइब्रेरी चल सके. हम बच्चों ने मिलकर लाइब्रेरी को सजाया. पोस्टर, झंडे लगाए. अब दूसरी लाइब्रेरियों की तरह बच्चे किताबें घर ले जाने की मांग करने लगे. मैंने स्कूल में अपने टीचर से पूछा कि ये कैसे किया जा सकता है. एक रजिस्टर तैयार किया और किताबें देने लगीं. इसका कोई शुल्क नहीं होता है. बच्चे किताबें ले जाते और वापस भी कर देते हैं. कई बार जब बहुत दिनों तक किताब वापस नहीं मिलती तो मैं खुद ही उनके घर चली जाती हूं. हमने लाइब्रेरी का नाम भी रखा है- बाल पुस्तकालय.
अब देशभर से मदद आने लगी है. लोग किताबें भेजते हैं. हमारे पास 1000 से भी ज्यादा पुस्तकें हो चुकी हैं और रोज 30 से 35 बच्चे आते हैं. अब भी पढ़ने के लिए वही चबूतरा है और तिरपाल.
पिछली जुलाई पापा नहीं रहे. वो मुझे देखकर, मेरी तस्वीर अखबारों में देखकर बहुत खुश होते थे. वो थोड़ा पढ़े थे, चाहते थे कि उनके बच्चे अंग्रेजी में बातचीत का जवाब अंग्रेजी में दें. मैं अब साथियों और भाई-बहनों से इंग्लिश में ही बोलने की कोशिश करती हूं, भले ही टूटी-फूटी सही.
12 बरस की मुस्कान उम्मीद हैं, एक ऐसे समाज की जो शब्दों से उम्मीद खो रहा है.
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