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चिपको आंदोलन' एक आदिवासी औरत गौरा देवी के अदम्य साहस और सूझबूझ की दास्तान है......
::/introtext::बात 1974 की है, जनवरी का महीना था, रैंणी गांव के वासियों को पता चला कि उनके इलाके से गुजरने वाली सड़क-निर्माण के लिए 2451 पेड़ों का छपान (काटने के लिए चुने गए पेड़) हुआ है. पेड़ों को अपना भाई-बहन समझने वाले गांववासियों में इस खबर से हड़कंप मच गया.
अलकनंदा की प्रलयकारी बाढ़ (1970) उनकी स्मृतियों में ऐसी थी, जैसे कल की बात हो. इस बाढ़ ने उत्तराखंड के जनजीवन और जंगल को जिस तरह तबाह किया था, उसके बाद ही पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास शुरू हुए. इनमें चंडी प्रसाद भट्ट, गोबिंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह जैसे जागरूक लोग थे.
23 मार्च 1974 के दिन रैंणी गांव में कटान के आदेश के खिलाफ, गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ. रैली में गौरा देवी, महिलाओं का नेतृत्व कर रही थीं. प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तारीख 26 मार्च तय की थी, जिसे लेने के लिए गांववालों को चमोली जाना था.
वन विभाग की सुनियोजित चाल
प्रशासनिक अधिकारियों की तेज बुद्धि का लोहा मानते हुए मुनाफाखोर ठेकेदार, मजदूरों के साथ, देवदार के जंगलों को काटने निकल पड़े. उनकी इस हलचल को एक लड़की ने देख लिया. उसे ये सब कुछ असहज लगा, उसने दौड़कर ये खबर गौरा देवी को दी, वो फौरन हरकत में आई.
उस समय, गांव में मौजूद 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर, वो भी जंगल की ओर चल पड़ी. देखते ही देखते महिलाएं, मजदूरों के झुंड के पास पहुंच गईं, उस समय मजदूर अपने लिए खाना बना रहे थे. गौरा देवी ने उनसे कहा, 'भाइयों, यो जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी-फल और लकड़ी मिलती है. जंगल को काटोगे तो बाढ़ आएगी, हमारे बगड़ बह जाएंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द लौटकर आ जाएंगे तो फैसला होगा.'
'लो मारो गोली और काट लो हमारा मायका'
ठेकेदार और उनके साथ चल रहे वन विभाग के लोग इस नई आफत से बौखला गए. उन्होंने महिलाओं को धमकाया, यहां तक कि गिरफ्तार करने की धमकी भी दी, लेकिन महिलाएं अडिग रहीं. ठेकेदार ने बंदूक निकालकर डराना चाहा तो गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुए कहा, 'लो मारो गोली और काट लो हमारा मायका', इस पर सारे मजदूर सहम गए. गौरा देवी के इस अदम्य साहस और आह्वान पर सभी महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं और उन्होंने कहा, 'इन पेड़ों के साथ हमें भी काट डालो.'
देखते ही देखते, जंगल के सभी मार्ग पर महिलाएं तैनात हो गईं. ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को हटाने की हर कोशिश की, यहां तक कि उन पर थूका भी गया. लेकिन गौरा देवी ने आपा नहीं खोया और पूरी इच्छा शक्ति के साथ अपना विरोध जारी रखा. आखिरकार थक-हारकर मजदूरों को लौटना पड़ा और इन महिलाओं का मायका बच गया.
अगले दिन खबर चमोली हेडक्वॉर्टर तक जा पहुंची. पेड़ों से चिपकने का ये नायाब तरीका अखबारों की सुर्खियां बन गईं. इस आंदोलन ने सरकार के साथ-साथ वन प्रेमियों का भी ध्यान आकर्षित किया.
मामले की गंभीरता को समझते हुए सरकार ने डॉ. वीरेंद्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की. जांच में पाया गया कि रैंणी के जंगलों के साथ ही अलकनंदा में बाईं ओर मिलने वाली समस्त नदियों, ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही और नंदाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों और कुंवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत आवश्यक है.
देश भर का हीरो बना दिया
पांचवीं क्लास तक पढ़ी ‘गौरा देवी’ की पर्यावरण विज्ञान की समझ और उनकी सूझबूझ ने अपने सीने को बंदूक के आगे कर के, अपनी जान पर खेल कर, जो अनुकरणीय काम किया, उसने उन्हें सिर्फ रैंणी गांव का ही नहीं, उत्तराखंड का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का हीरो बना दिया. विदेशों में उन्हें ‘चिपको वूमेन फ्रॉम इंडिया’ कहा जाने लगा.
चिपको आंदोलन' एक आदिवासी औरत गौरा देवी के अदम्य साहस और सूझबूझ की दास्तान है.
1925 में चमोली जिले के एक आदिवासी परिवार में जन्मी, केवल पांच दर्जे तक पढ़ी, गौरा देवी ने आज से 43 साल पहले पेड़ और उसे काटने वाले आरे के बीच खुद को खड़ा कर के, सिर्फ आंदोलन ही नहीं चलाया बल्कि देश को पर्यावरण के बारे में सोचना भी सिखाया.
2011 में, मशहूर पर्यावरणविद ‘वंदना शिव’ ने इंडिया टुडे मैगजीन से बात करते हुए कहा था कि चिपको मूवमेंट ने ही हमें पर्यावरण विभाग और पर्यावरण मंत्रालय दिया. इसी आंदोलन के बाद पर्यावरण से जुड़े नए कानून बनाए गए.' मैं अक्सर अपने विद्यार्थियों से कहता हूं, कि मात्रा का सिद्धांत मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ओंटारियो, कनाडा से सीखा और पर्यावरण यानी परिस्थिति विज्ञान की शिक्षा ‘चिपको-यूनिवर्सिटी’ ऑफ उत्तराखंड से पाई.
पर्वतीय दोहन खुलेआम किया गया
ये कहानी शुरू होती है भारत-चीन युद्ध के बाद, पर्वतीय सीमाओं तक सैनिकों की आवाजाही के लिए बनाई जाने वाली सड़क निर्माण से. इस दौरान, रक्षा के नाम पर, पर्वतीय दोहन खुलेआम किया गया. लेकिन इलाके के जागरूक लोगों ने इस खतरे को भांपा और इसके विरोध में अपनी आवाज बुलंद की. चंडी प्रसाद भट्ट 1964 से इस काम में लगे हुए थे.
गौरा देवी ने भी इस खतरे को समझा और इसके लिए जागरूकता फैलाने में लग गईं. ‘हम लोग खतरे में जी रहे हैं’, गौरा देवी की जुबां पर हर समय यही रहता था.
एक छोटी सी घटना ने, गौरा देवी के दर्द को, उनकी आवाज को देश और दुनिया से रू-ब-रू करा दिया. सूचना की पहरेदारी पर बैठे लोग अपना मुंह देखते रह गए. रैंणी गांव की उसी छोटी सी घटना को ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है.
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