सर्दियों में भीषण ठंड और भारी बर्फवारी की चपेट में रहने वाले चारों धामों के कपाट अक्टूबर-नवंबर में श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए जाते हैं, जो अगले वर्ष अप्रैल-मई में दोबारा खुलते हैं.......
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करवा चौथ के दिन रात के समय चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है.
खास बातें
नई दिल्ली: करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु लंबी होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. सुहागिन महिलाओं के अलावा कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत को रखती है. कहते हैं कि अगर पूरे विधि-विधान से इस व्रत को रखा जाए तो मनवांछित जीवन साथी मिलता है. करवा चौथ के दिन महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत रखती हैं और रात में चांद को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों पानी पीकर अपना उपवास तोड़ती हैं. निर्जला रहने के अलावा भी करवा चौथ के व्रत के कई नियम हैं, जो इस प्रकार हैं:
1. वैसे तो किसी भी व्रत के कुछ आधारभूत नियम होते हैं, जैसे कि क्रोध न करना, किसी की बुराई न करना, मुख से अपशब्द न निकालना आदि. ठीक इसी तरह करवा चौथ के व्रत के दिन भी यह नियम लागू होता है. अगर आप व्रत कर रही हैं तोअपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखें. कहते हैं कि अगर इस दिन क्रोध किया जाए तो व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता है.
2. व्रत की शुरुआत सरगी खाकर करें. सरगी सूर्योदय से पहले खानी चाहिए. जिस वक्त आप सरगी खाएं उस वक्त दक्षिण पूर्व दिशा की ओर मुख कर के ही बैठें.
3. करवा चौथ पर दिन भर निर्जला व्रत रखा जाता है. यानी कि अन्न-जल के अलावा पानी पीने की भी मनाही होती है. सुहागिन महिलाएं चांद को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों पानी पीकर व्रत तोड़ती हैं. वहीं, कुंवारी लड़कियां तारों के दर्शन करने के बाद पानी पी सकती हैं. वैसे तो गर्भवती और बीमार महिलाओं को करवा चौथ का व्रत नहीं करना चाहिए. लेकिन कई गर्भवती महिलाएं फल और पानी पीकर भी यह व्रत कर सकती हैं.
4. करवा चौथ के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं. इस दिन सुहाग के रंग जैसे कि लाल, पीले और हरे रंग की साड़ी, सलवार सूट और लहंगे का सर्वाधिक चलन है. इस दिन काले और सफेद कपड़े पहनने से बचना चाहिए.
5.करवा चौथ के व्रत के दिन चांद को अर्घ्य देना बेहद जरूरी और शुभ माना गया है. इस दिन महिलाएं सबसे पहले छलनी पर दीपक रखती हैं. इसके बाद छलनी से पहले चांद को और फिर पति को देखती हैं. इसके बाद चांद को अर्घ्य दिया जाता है. आखिर में महिलाएं पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर अपना व्रत खोलती हैं.
6. इसके बाद भगवान को भोग लगाएं और फिर पति के साथ बैठकर भोजन करें. साथ ही यह पति-पत्नी दोनों के लिए जरूरी है कि वे सिर्फ करवा चौथ के दिन ही नहीं बल्कि हमेशा एक-दूसरे का सम्मान करें ताकि उनका रिश्ता हमेश प्यार की डोर से बंधा रहे.
हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान में खीर रखने के बाद खाने की परांपरा काफी समय से चली आ रही हैं। मान्यता है कि इस दिन खुले आसमान में रखी जाने वाली इस खीर को खाने से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चांद अपनी सभी 16 कलाओं से भरा होता है, जिस वजह से चांद रात 12 बजे धरती पर अमृत बरसाता है।

इसी अमृत को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करने के लिए खीर चांद की रोशनी में रखी जाती है रात 12 बजे के बाद खीर उठाकर प्रसाद के तौर पर खाई जाती है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि ऐसा क्यों किया जाता है? इस बार शरद पूर्णिमा 13 अक्टूबर को है, जानते हैं आखिर क्यों इस खुले आसमान में रखे जाने वाली खीर को खाने के सेहत को क्या फायदे होते हैं।

मलेरिया के प्रकोप से बचाता है खीर
मच्छरों के काटने पर मलेरिया के बैक्टीरिया शरीर में फैलते हैं, जिससे आपको मलेरिया होता है। लेकिन बैक्टीरिया बिना उपयुक्त वातावरण के नहीं पनप सकते है। मलेरिया के बैक्टीरिया को जब पित्त का वातावरण मिलता है, तभी वह 4 दिन में पूरे शरीर में फैलता है, नहीं तो थोड़े समय में समाप्त हो जाता है। ऐसे में मलेरिया फैलने का मुख्य कारण है शरीर में पित्त का बढ़ना या पित्त का असंतुलन। यानि पित्त को नियंत्रित रखकर, हम मलेरिया से बच सकते हैं। खीर खाने से पित्त को संतुलित किया जा सकता है। इसलिए पित्त के असंतुलन से बचने के लिए इस समय खास तौर से खीर खाने की परंपरा है।
शरद पूर्णिमा को रातभर चांदनी के नीचे चांदी के पात्र में रखी खीर सुबह खाई जाती है। यह खीर हमारे शरीर में पित्त का प्रकोप कम करती है। और मलेरिया के खतरे को कम करती है।

आंखों की रोशनी के लिए फायदेमंद
यह खीर आंखों से जुड़ी बीमारियों से परेशान लोगों को भी बहुत फायदा पहुंचाती है। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा का चांद बेहद चमकीला होता है इसीलिए आंखों की कम होती रोशनी वाले लोगों को इस चांद को एकटक देखते रहना चाहिए। क्योंकि इससे आंखों की रोशनी में सुधार होता है। इसी के साथ यह माना जाता है कि इस रात के चांद की चांदनी में आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए सुई में 100 बार धागा डालना चाहिए।

दमा रोगियों के लिए अमृत
दमा रोगियों के लिए यह खीर अमृत समान ही होती है। शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में खीर रखने के बाद सुबह चार बजे के आसपास दमा रोगियों को खा लेनी चाहिए। इसलिए डॉक्टर्स भी दमा रोगियों को ये खीर खाने की सलाह देते हैं।

दिल के मरीजों के लिए भी फायदेमंद
चर्म रोग में फायदा दिलाने के साथ शरद पूर्णिमा का चांद और खीर दिल के मरीज़ों और फेफड़े के मरीज़ों के लिए भी काफी फायदेमंद होती है। इसे खाने से श्वांस संबंधी बीमारी भी दूर होती हैं।

स्किन प्रॉब्लम करें दूर
शरद पूर्णिमा की खीर को स्किन रोग से परेशान लोगों के लिए भी अच्छा बताया जाता है। मान्यता है कि अगर किसी भी व्यक्ति को चर्म रोग हो तो वो इस दिन खुले आसमान में रखी हुई खीर खाए। इसके अलावा इससे त्वचा भी क्रांतिमान हो जाती है।

शरद पूर्णिमा की रात को छत पर खीर को रखने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी छिपा है। खीर दूध और चावल से बनकर तैयार होता है। दरअसल दूध में लैक्टिक नाम का एक अम्ल होता है। यह एक ऐसा तत्व होता है जो चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। वहीं चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया आसान हो जाती है। इसी के चलते सदियों से ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है और इस खीर का सेवन सेहत के लिए महत्वपूर्ण बताया है। एक अन्य वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार इस दिन दूध से बने उत्पाद का चांदी के पात्र में सेवन करना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं।