असल में ईद से पहले यानी रमजान में जकात अदा करने की परंपरा है। यह जकात भी गरीबों, बेवाओं व यतीमों को दी जाती है....
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वट सावित्री व्रत हिन्दू धर्म को मानने वाली स्त्रियों के लिए बेहद खास है. मान्यता है कि इस व्रत को रखने से पति पर आए संकट चले जाते हैं और आयु लंबी हो जाती है. यही नहीं अगर दांपत्य जीवन में कोई परेशानी चल रही हो तो वह भी इस व्रत के प्रताप से दूर हो जाते हैं. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए इस दिन वट यानी कि बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं. इस दिन सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का विधान है. मान्यता है कि इस कथा को सुनने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले आई थी.
वट सावित्री व्रत की कथा -
पौराणिक कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी. उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक तप किया जिससे प्रसन्न हो देवी सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री का वरदान दिया. फलस्वरूप राजा को पुत्री प्राप्त हुई और उस कन्या का नाम सावित्री ही रखा गया.
सावित्री सभी गुणों से संपन्न कन्या थी, जिसके लिए योग्य वर न मिलने के कारण सावित्री के पिता दुःखी रहने लगे. एक बार उन्होंने पुत्री को स्वयं वर तलाशने भेजा. इस खोज में सावित्री एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से होती है. द्युमत्सेन उसी तपोवन में रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था. सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखकर उन्हें पति के रूप में वरण किया.
इधर, यह बात जब ऋषिराज नारद को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति से जाकर कहने लगे- आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल की है. सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु वह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी. नारद जी के वचन सुन राजा अश्वपति का चेहरा विवर्ण हो गया. "वृथा न होहिं देव ऋषि बानी" ऎसा विचार करके उन्होने अपनी पुत्री को समझाया कि ऐसे अल्पायु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं है. इसलिए अन्य कोई वर चुन लो.
इस पर सावित्री अपने पिता से कहती है कि पिताजी- आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती है, तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है. अब चाहे जो हो, मैं सत्यवान को ही वर रूप में स्वीकार कर चुकी हूं. इस बात को सुन दोनों का विधि-विधान के साथ पाणिग्रहण संस्कार किया गया और सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा में रत हो गई. समय बदला, नारद का वचन सावित्री को दिन -प्रतिदिन अधीर करने लगा. उसने जब जाना कि पति की मृत्यु का दिन नजदीक आ गया है तब तीन दिन पूर्व से ही उपवास शुरू कर दिया. नारद द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया. नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकड़ी काटने के लिए चला गया तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में चलने के लिए तैयार हो गई़.
सत्यवान वन में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिये वृ्क्ष पर चढ़ गया. वृ्क्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी. वह व्याकुल हो गया और वृक्ष से नीचे उतर गया. सावित्री अपना भविष्य समझ गई तथा अपनी गोद का सिरहाना बनाकर अपने पति को लिटा लिया. उसी समय दक्षिण दिशा से अत्यन्त प्रभावशाली महिषारुढ़ यमराज को आते देखा. धर्मराज सत्यवान के जीवन को जब लेकर चल दिए तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी. पहले तो यमराज ने उसे देवी-विधान समझाया परन्तु उसकी निष्ठा और पतिपरायणता देख कर उसे वर मांगने के लिए कहा.
सावित्री बोली- "मेरे सास-ससुर वनवासी तथा अंधे है. उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें." यमराज ने कहा, "ऐसा ही होगा और अब तुम लौट जाओ." यमराज की बात सुनकर उसने कहा, "भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है. पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है." यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिये कहा. सावित्री बोली, "हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे वे पुन: प्राप्त कर सकें, साथ ही धर्मपरायण बने रहें." यमराज ने यह वर देकर कहा, "अच्छा अब तुम लौट जाओ परंतु वह न मानी."
यमराज ने कहा कि पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो और लौट जाओ. इस बार सावित्री ने अपने को सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा. यमराज ने तथास्तु कहा और आगे चल दिए. सावित्री फिर भी उनके पीछे-पीछे चलती रही. उसके इस कृत से यमराज नाराज हो जाते हैं. यमराज को क्रोधित होते देख सावित्री उन्हें नमन करते हुए उन्हें कहती है, "आपने मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का आशीर्वाद तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं मां किस प्रकार से बन सकती हूं, इसलिये आप अपने तीसरे वरदान को पूरा करने के लिए अपना कहा पूरा करें."
सावित्री की पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया. सावित्री सत्यवान के प्राण लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची और सत्यवान जीवित होकर उठ बैठे. दोनों हर्षित होकर अपनी राजधानी की ओर चल पडे. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि उनके माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है. इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे.
वट सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 02 जून 2019 को शाम 04 बजकर 39 मिनट से
अमावस्या तिथि समाप्त: 03 जून 2019 को दोपहर 03 बजकर 31 मिनट तक
नई दिल्ली: रमजान महीने की आखिरी जुम्मे की नमाज 31 तारीफ को पढ़ी जाएगी. इसे जमात उल विदा कहते हैं. इस्लाम में जुम्मे की नमाज़ को बहुत खास माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन अल्लाह को याद करने से वो सारे गुनाहों को माफ कर देते हैं. जमात उल विदा को उर्दू में अलविदा जुम्मा मतलब होता है. इसके बाद ही ईद-उल-फितर यानी मीठी ईद मनाई जाती है. इस बार मीठी ईद 5 या 6 मई को मनाई जाएगी.
जमात उल विदा के दिन सभी रोजेदार नमाज अदा करने मस्जिद जाते हैं. इस नमाज में रोजेदार अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और फरियाद करते हैं. सिर्फ रमजान के दौरान ही नहीं बल्कि इस्लाम धर्म में हर जुम्मे (शुक्रवार) की नमाज को खास माना जाता है. मान्यता है कि जुम्मे की दिन ही अल्लाह ने इंसान को बनाया था. इस वजह से इस्लाम में जुम्मे के दिन नमाज के साथ-साथ दान भी किया जाता है.
मीठी ईद से पहले इस आखिरी जुम्मे की नमाज के दिन को हंसी-खुशी मनाया जाता है. इफ्तार में पकवान के साथ-साथ रोजेदार नए कपड़े पहनकर मस्जिद जाते हैं. बता दें, इस बार ईद 5 या 6 मई को हो सकती है.
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