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बिलासपुर । ” कहते हैं न कि जब परिंदों के हौसलों में शिद्दत होती है तो आसमान भी अपना कद झुकाने लगता है “” बस उसके हौसले बुलंद होने चाहिए। हमने बहुत से ऐसे लोगों को देखा है जो बोल, सून, देख नहीं सकते पर काम कर लेते है। ये सिर्फ न ऐसा असंभव काम करते है बल्कि दुनिया के लिए मिशाल बन जाते हैं। आज हम आपको एस ऐसी ही दिव्यांग युवक के बारे में बताने वाले है जिसके बारे में जानकर आपको असंभव को संभव करने की ताकत मिलेगी। जी हां दिव्यांग महेंद्र पाल ने शतरंज के खेल में अपने हुनर के बदौलत बड़े से बड़े खिलाड़ी को मात दे दी है. भगवान ने महेंद्र पाल को भले ही दिव्यांग बनाया है, मगर इसने खुद की मेहनत और लगन से कई ऐसे बडे खिलाडियों को शतरंज में हराया है. जिस पर आज पूरा देश गर्व कर रहा है.
बिलासपुर के तखतपुर इलाके के पड़रिया गांव के गरीब परिवार में जन्मे महेंद्र पाल जन्म से ही बोल और सुन नहीं पाते. महेंद्र ने पढ़ाई बिलासपुर के तिफरा स्थित अंधमुकबधिर शाला में की है. महेंद्र पाल के पिता साधुराम पाल बताते है कि बचपन से महेंद्र का रुझान खेल के प्रति रहा है. यही वजह है कि वह टाइम पास के लिए घर मे कभी कभी शतरंज का खेल खेलता था. धीरे धीरे महेंद्र की दिलचस्पी इस खेल के प्रति बढ़ते जा रहा थी. यही वजह है कि उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के प्रतियोगिता में सफल प्रदर्शन करना चालू कर दिया. जिसके बदौलत उसका चयन इंग्लैंड के मैनचेस्टर में 6 से 16 जुलाई तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता के लिए हुआ.
मगर गरीबी की वजह से विदेश का खर्च उठा पाने में परिवार सक्षम नहीं था. बड़ी मुश्किल से परिवार वाले, दोस्त और अन्य लोगों ने मदद की. लोगों की मदद से महेंद्र पाल विदेश में आयोजित इस प्रतियोगिता में शामिल हो सका. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस प्रतियोगिता में 18 देशों के प्रतियोगियों ने हिस्सा लिया. प्रतियोगिता में महेंद्र पाल व छत्तीसगढ़ के चार अन्य खिलाड़ियों ने भारत का प्रतिनिधित्व किया. इस प्रतियोगिता में किसान पुत्र महेंद्र ने कुल 9 मैचों में 4 मैच जीतकर एक विशिष्ट पहचान बनाई है. उनके इस कामयाबी से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश का नाम रोशन हुआ ..विदेश से लौटने पर तखतपुर नगर में महेंद्र का खेल प्रेमियों व स्थानीय लोगों ने आतिशबाजी कर जोरदार स्वागत किया।
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