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पानी का यह संकट : प्लंबिंग के पेशे में उतरीं महिलाएं.....
::/introtext::दुनिया में कोई काम सिर्फ़ मर्द या औरत का नहीं होता। कुदरत ने दोनों के साथ कोई भेद नहीं किया। लेकिन, समाज ने औरतों के साथ हमेशा फ़र्क बरता है। माना गया कि औरत का काम घर संभालने और बच्चे पैदा करने तक ही सीमित है। लेकिन जिस समाज ने भी औरतों को आगे बढ़ने का मौक़ा दिया है, वहां उन्होंने मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर, बल्कि कई बार तो आगे बढ़कर अपना हुनर दिखाया है। महिलाओं के हुनर की एक अच्छी मिसाल देखने को मिलती है, अरब देश जॉर्डन में। जहां महिलाओं ने ख़ुद को स्वाबलंबी बनने के लिए वो पेशा अपनाया है, जो सिर्फ़ मर्दों का माना जाता था। जॉर्डन का लगभग 75 फ़ीसदी हिस्सा रेगिस्तान है। इसकी सरहद सऊदी अरब, इराक़, सीरिया, इज़रायल और फ़लिस्तीन से मिलती है। हालांकि डेड सी जॉर्डन के पास ही है। मगर उसका पानी बेहद ख़ारा है। नतीजा ये है कि जॉर्डन के लोगों के पास पानी की बेहद कमी है। और जो बचा-खुचा पानी है भी, वो भी तेज़ी से ख़त्म हो रहा है। एक अंदाज़ के मुताबिक़ जॉर्डन के लोगों को साल में औसतन 150 क्यूबिक मीटर पानी मिलता है। जबकि एक अमरीकी नागरिक औसतन इसका छह गुना यानी 900 क्यूबिक मीटर पानी हर साल इस्तेमाल के लिए पाता है। दुनिया के औसत की बात करें, तो बाक़ी दुनिया के मुक़ाबले जॉर्डन के लोग महज़ एक चौथाई हिस्से के बराबर पानी पाते हैं।
प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में मनुष्य के लिए जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें गर्भ संस्कार भी एक प्रमुख संस्कार माना गया है। चिकित्सा विज्ञान यह स्वीकार कर चुका है कि गर्भस्थ शिशु किसी चैतन्य जीव की तरह व्यवहार करता है तथा वह सुनता और ग्रहण भी करता है। माता के गर्भ में आने के बाद से गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है तथा दिव्य संतान की प्राप्ति की जा सकती है।
नई दिल्ली
यौन उत्पीड़न और ऐसिड अटैक जैसी जघन्य घटनाओं से पीड़ित महिलाओं को आर्थिक मदद देने के लिए नैशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने मुआवजे की राशि तय की है। केंद्र सरकार से मशविरे के बाद अथॉरिटी ने 5 से 7 लाख रुपये का न्यूनतम मुआवजा दिए जाने की रिलीफ पॉलिसी तैयार की है। इस स्कीम के तहत रेप और गैंगरेप पीड़ितों को मदद देने के लिए न्यूनतम राशि तय की जाएगी। अथॉरिटी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर यह स्कीम तैयार की गई है। जिसके तहत रेप, गैंगरेप और ऐसिड अटैक से पीड़ित ग्रामीण महिलाओं और पीड़ित परिवारों को मदद देने की बात कही गई है, जो संसाधनों से हीन हैं और कानूनी लड़ाई के लिए जिन्हें मदद की दरकार रहती है
स्कीम के मुताबिक गैंगरेप या जान चली जाने के मसले पर पीड़ित या उसके परिवार को न्यूनतम 5 लाख रुपये और अधिकतम 10 लाख रुपये की मदद राशि दी जाएगी। इसके अलावा रेप या अप्राकृतिक सेक्स के मामले में न्यूनतम 4 लाख रुपये की राशि दी जाएगी। शरीर के किसी अंग को नुकसान पहुंचने या फिर 80 फीसदी तक विकलांगता की स्थिति में 2 लाख रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा गंभीर रूप से चोट लगने पर भी 2 लाख रुपये का प्रावधान है। यह स्कीम सभी राज्यों के लिए लागू होगी।
भ्रूण को नुकसान पहुंचने या फिर गर्भपता होने की स्थिति में भी न्यूनतम 2 लाख रुपये की राहत राशि दिए जाने का प्रावधान तय किया गया है। स्कीम के मुताबिक यदि कोई महिला कई अपराधों के तहत पीड़ित है तो वह मुआवजे की पूरी राशि के लिए हकदार होगी। यदि गैंगरेप की पीड़िता की मौत हो जाती है तो उसके परिवार को 10 लाख रुपये की राशि मिलेगी। 5 लाख रुपये गैंगरेप के एवज में और 5 लाख रुपये मौत के मुआवजे के तौर पर।
फिलहाल अलग-अलग राज्य सरकारें रेप पीड़िताओं को अपने स्तर पर अलग-अलग राशि राहत के तौर पर मुहैया कराती हैं। जैसे ओडिशा सरकार 10,000 रुपये देती है और गोवा सरकार 10 लाख रुपये तक की राशि देती है। महाराष्ट्र ऐसा पहला राज्य है, जहां ऐसे मामलों को लेकर कोई नियम नहीं है। अलग-अलग राज्यों में पीड़ितों को मिलने वाली राशि अलग-अलग है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की बेंच ने गुरुवार को सैद्धांतिक रूप से ऐसी स्कीम लागू करने की बात कही थी। बेंच ने कहा था, 'अलग-अलग राज्यों में पीड़ितों को अलग-अलग राहत राशि नहीं दी जा सकती। रेप के मामले में पीड़िताओं के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए। देश भर में कॉम्पेन्सेशन की राशि एक समान होनी चाहिए।'
जानें, कैसे तय होगी राहत की राशि
जलने और ऐसिड अटैक से पीड़ित महिला यदि पूरी तरह जल जाती है तो 7 लाख रुपये की राशि मिलेगी और यदि 50 फीसदी शरीर झुलसता है तो यह आंकड़ा 5 लाख रुपये का होगा। स्कीम के मुताबिक ऐसिड अटैक की पीड़िता को शुरुआती 15 दिनों में 1 लाख रुपये की राशि दी जाएगी और उसके बाद दो महीने के भीतर 2 लाख रुपये दिए जाएंगे।